इस अनूठे मेले में लाखों के गहने पहनती हैं महिलाएं 10 लाख से ज्यादा की ज्वेलरी पहनी पहुंचीं खेजड़ली में जुटा बिश्नोई।
पर्यावरण को बचाने के लिए जोधपुर में शहीद हुए 363 लोगों की याद में हर साल शहर से करीब 2.2 किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव में खेजड़ली शहीदी मेला लगता है।
अमृता देवी ने 293 साल पहले आज ही के दिन अपनी तीन बेटियों के साथ खेजड़ी के वृक्ष को बचाने के लिए शहादत दी थी। सोमवार को भी बड़ी संख्या में बिश्नोई समाज की महिलाएं और पुरुष इस मैले में जुटे। इस मेले की खासियत यह है कि इसमें हर महिला 20 से 30 लाख रुपए के गहने पहन कर आती हैं। बताया जाता है कि यह विश्नोई समाज में महिलाओं का उत्साह जताने का पर्व है। मेले में आई गीता देवी और पिंकी देवी ने बताया कि यह उत्साह दिखाने का तरीका है। हर महिला 40 से 50 तोला तक गहने पहनती है। महिलाओं को किसी प्रकार का डर भी नहीं होता। यहां शहीदों को याद करते हुए हवन कुंड में आहुतियां दी गई। साथ ही शहीद स्मारक पर लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की महिलाओं ने बताया कि बिश्नोई समाज पर्यावरण का सच्चा संरक्षक है। हर साल इस दिन को बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण की रक्षा के लिए बलिदान
दिया था और आज भी हमारे समाज का हर व्यक्ति
पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी जान देने के लिए
तैयार रहता है।
गांव में भरे मेले में विश्रोई समाज के लोग हजारों की संख्या
यज्ञ के साथ शुरू हुआ मेला
सुबह यज्ञ के बाद पवित्र अभिमंत्रित जल किया गया।
इसके बाद ध्वजारोहण से मेले की शुरुआत हुई। देश
एवं विदेश से बिश्नोई समाज सहित अन्य समाजों के
पर्यावरण प्रेमी मेले में पहुंचे लोगों ने हवन में नारियल
से आहुतियां दीं।
मेला स्थल पर यश में लोगों ने कपिल से आहुतिया दी।
बिना डर लाखों के गहने पहने इस मेले में महिलाएं बिना डर आभूषण पहनती हैं। एक एक महिला 25 से 30 लाख तक के गहने पहन कर आती है। सोमवार को भी मेले में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। महिलाओं ने भास्कर से बातचीत में
बताया कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनका उत्साह है।
और इसी उत्साह को दिखाने के लिए वे पूरे जोश के
साथ इस मेले में हिस्सा लेती है।
महिलाएं इस मेले में लाखों के गहने पहनकर पहुंचती हैं और
यहां किसी का डर भी नहीं।
धर्म सभा में दिया संदेश इस मौके पर बिश्नोई समाज के प्रबुद्ध लोगों की सभा भी आयोजित की गई। अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के अध्यक्ष देवेंद्र बुड़िया, लूणी विधायक महेंद्र बिश्नोई, लोहावट विधायक किसनाराम बिश्नोई, पूर्व विधायक मलखान बिश्नोई समेत समाज के अन्य नेता मौजूद रहे। समाज में व्याप्त नशे की बुरी आदतों सहित अन्य बुरी आदतों को त्यागने और एकजुटता का संदेश दिया गया।
मेला स्थल पर ही सभा का भी आयोजन किया गया जिसमे शिक्षा को देने का संदेश दिया गया।
1730 में एक ही दिन कुर्बानी खेजड़ली शहीदी मेला पूरी दुनिया में सबसे अनूठा है। काफी साल पहले अमृता देवी के नेतृत्व में 363 महिला-पुरुषों व बच्चों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। उनकी याद में यह मेला लगता है। जिस दिन यह शहीदी हुई उस दिन भाद्रपद माह की दशमी थी और तारीख 21 सितम्बर 1730 थी। तभी से इसी तिथि पर यह मेला लगता है।
शहीदों की पाट में बने स्मारक पर भी नमन करते हैं समाज के लोग
जब महल बनाने के लिए लकड़ी लेने आए थे सैनिक 21 सितम्बर 1730 मंगलवार को मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा अभय सिंह नया महला बनवा रहे थे। महल निर्माण के लिए लकड़ियों की जरूरत थी और खेजड़ली
गांव से पेड़ काटकर लाने का आदेश दिया गया। सैनिक खेजड़ली गांव में पहुंच गए। रामू खोड़ के घर के बाहर लगा खेजड़ी का पेड़ काटने लगे तो रामू की पत्नी अमृता देवी ने विरोध किया। वह पेड़ से चिपक गई। सैनिकों ने उन्हें कुल्हाड़ी से काट दिया। इसके बाद अमृता देवी की तीनों बेटियों आसू, रत्नी और भागू बाई भी एक-एक पेड़ को बचाने के लिए तने से लिपट गई और सैनिकों ने उन्हें भी काट दिया। यह बात पूरे गांव में फैली तो लोग खेजड़ी के पेड़ों से लिपट गए। राजा के सैनिकों ने 71 महिलाओं व 292 पुरुषों यानी कुल 363 लोगों को काट दिया। यह बात जब राजा को पता चली तो उसके बाद से उन्होंने
खेजड़ली के पेड़ को काटने पर प्रतिबंध लगा दिया।




