देश में सबसे बड़ा 30 हजार करोड़ का स्टाम्प पेपर घोटाला करने वाले अब्दुल करीम तेलगी पर बनी वेब सीरीज स्कैम 2003 द तेलगी स्टोरी चर्चा में है। सीरीज में जिस घोटाले को दिखाया गया है, उसकी जड़े राजस्थान से भी जुड़ी हैं बेशुमार दौलत कमाने वाला तेलगी शेखावाटी के युवाओं को फर्जी डिग्रियों और पासपोर्ट बनाकर विदेश भेजता था। तब लोग उसे 'लाला' कहकर बुलाते थे। जिस बार डासर तरन्नुम खां पर तेलगी ने एक रात में 84 लाख रुपए लुटाए, उसे राजस्थान में करोड़ों की प्रॉपर्टी भी दिलवाई थी। चुनाव जीतने के लिए तेलगी अपने क्षेत्र के लोगों को अजमेर दरगाह शरीफ की फ्री यात्रा करवाता था। तेलगी के राजस्थान कनेक्शन की पड़ताल के लिए हमने इस घोटाले का खुलासा करने वाले जर्नलिस्ट संजय सिंह से बात की उन्हीं की लिखी किताब पर ये वेब सीरीज बनी है..... ट्रेन में फल बेचता था करीम अब्दुल करीब तेलगी महाराष्ट्र बॉर्डर पर स्थित कर्नाटक के खानपुर करने का रहने वाला था। पिता लाडसाब तेलगी भारतीय रेलवे कर्मचारी और मा शरीफबी लाडसाब तेलगी हाउस वाइफ थीं तीन भाई बहनों में तेलगी दूसरे नंबर पर था। बचपन में ही बीमारी से अचानक उसके पिता की मौत हो गई थी। इसके बाद
तेलगी ने घर के गुजारे के लिए ट्रेनों में फल बेचना शुरू
कर दिया।
अब्दुल करीमी की ट्रेन में फल बेचता था
इस कमाई से वो अपने स्कूल की फीस भरता और
परिवार का खर्चा भी उठाता तेलगी ने बेलगाम के गोगट
कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ग्रेजुएशन कंप्लीट की। ट्रेन
में फल बेचने के दौरान ग्राहक को मनाने की कला से
वो बोलने में माहिर हो गया था। इस दौरान ट्रेन में ऐसे
ही एक सेठ की उस पर नजर पड़ी। सेठ ने तेलगी को
नौकरी के लिए मुंबई बुला लिया।
7 साल सऊदी अरब रहने के बाद वापस मुंबई आया
तेलगी का बचपन से ही शोहरत की जिंदगी जीने का
सपना था। इसके लिए वो मुंबई में कुछ साल नौकरी के
बाद सऊदी अरब गया। सात साल वहां गुजारने के बाद
वह वापस मुंबई आ गया। इसके बाद उसने न्यू मरीन
लाइन्स में अरेबियन मेट्रो ट्रेवल्स नाम से एक कंपनी
भी खोली। यह 1990 का दौर था, जब लोग काम की
तलाश में अरब देशों में जाते थे। तेलगी ने पैसे कमाने
के लिए फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेज बनाकर लोगों को
अरब देशों में भेजने का काम शुरू किया।
राजस्थानियों को सऊदी भेजकर की घोटालों की
शुरुआत
सऊदी में सात साल नौकरी करने के बाद तेलगी
वापस मुंबई आ गया था। यह 1990 का दौर था जब
राजस्थान में शेखावाटी एरिया से अधिकतर युवा नौकरी
के लिए फौज में जाते थे जो युवा कम पढ़े लिखे थे,
जिनके पास डिग्रियां नहीं होती थी वे पैसा कमाने के
लिए सऊदी जाते थे।
इधर, तेलगी ने मुंबई में लौटने के बाद ट्रेवल एजेंट का
काम शुरू कर दिया था। युवाओं को नौकरी की तलाश
में सऊदी भिजवाता था। इसके लिए तेलगी इन युवाओं
की फर्जी डिग्रियां और पासपोर्ट बनवाता था। तेलगी के
सबसे ज्यादा ग्राहक राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र के युवा
होते थे।
तेलगी को लोग 'लाला' नाम से बुलाते थे
तेलगी राजस्थान में लाला के नाम से फेमस हो गया था।
अब किसी को भी सऊदी जाना होता था तो वो लाला से
संपर्क करता था।
वर्ष 1993 में इमिग्रेशन अथॉरिटी ने तेलगी को फर्जी
डिग्रियां और स्टाम्प बनाने के मामले पकड़ कर जेल
भिजवाया था, लेकिन यहीं से तेलगी की किस्मत भी
बदलने वाली थी। जेल में उसकी मुलाकात राम रतन
सोनी से हुई सोनी कलकत्ता (अब कोलकाता) में
सरकारी स्टाम्प वेंडर था दोनों ने जेल में शेयर मार्केट में
सबसे बड़ा स्कैम करने वाले हर्षद मेहता की तरह स्टाम्प
से पैसा बनाने की साजिश रची
पॉलिटिकल कनेक्शन से स्टाम्प वेंडर का लाइसेंस लिया
1994 में जेल से बाहर आते ही तेलगी ने पॉलिटिकल
कनेक्शन बनाए। उस समय स्टाम्प वेंडर का लाइसेंस
आसानी से नहीं मिलता था लेकिन तेलगी ने
पॉलिटिकल कनेक्शन से लीगल स्टाम्प वेंडर का
लाइसेंस लिया। इसके बाद राम रतन सोनी और तेलगी
दोनों मिलकर जाली स्टाम्प पेपर तैयार करने लगे।
फर्जी स्टाम्प से दोनों पैसा कमाने लगे, लेकिन 1995
में सोनी और तेलगी के बीच हिसाब-किताब को लेकर
विवाद हो गया। इसके बाद दोनों अलग हो गए। फर्जी
स्टाम्प के मामले में तेलगी को पुलिस ने गिरफ्तार कर
लिया और उसका लाइसेंस भी कैंसिल हो गया।
नासिक प्रेस से नीलामी में खरीदी स्टाम्प पेपर छापने की
मशीन
तेलगी ने इस बार जेल से बाहर आने के बाद फर्जी
स्टाम्प बनाने की बजाय स्टाम्प पेपर छापने का प्लान
बनाया उस समय देश भर में सप्लाई होने वाले स्टाम्प
नासिक की सरकारी प्रेस से छपते थे प्रेस में खराब
होने वाली मशीनों के पार्ट्स अलग करके नीलामी में बेचे
जाते थे
तेलगी ने प्रेस के अधिकारियों के साथ मिलकर अच्छी
कंडीशन वाली मशीनों को खराब बताकर नीलाम कराने
का प्लान बनाया। इसके बाद अपने साथियों के नाम
से अलग-अलग कंपनियां बनाकर नीलामी में वो सारी
मशीनें खरीद ली
पकड़े जाने के बाद भी अगस्टा को पटाने की
प्रेस के अधिकारियों से तेलगी ने स्टाम्प छापने की इक
और प्लेट्स भी खरीद लीं। फिर 1996 में मिंट रोड
पर खुद की स्टाम्प छापने की प्रेस लगा ली। यहां उसने
नीलामी में खरीदी अलग-अलग मशीनों के पार्ट्स को
जोड़कर स्टाम्प छापने की प्रेस लगा ली। अब तेलगी 10
रुपए से लेकर 1000 रुपए के स्टाम्प छापने लगा।
देशभर में स्टाम्प बेचने के लिए 300 से ज्यादा सेल्समैन
हायर किए
तेलगी ने खुद की प्रेस में छपने वाले स्टाम्प को बेचने के
लिए देश के 18 राज्यों और 72 शहरों में अपने 300
से ज्यादा सैल्समैन हायर किए। एमबीए किए यह लड़के
कॉर्पोरेट, लॉ फर्म, शेयर बाजार में काम करने वालों
को डिस्काउंट पर स्टाम्प बेचते थे इसे पहले लोगों को
लाइन में लगकर स्टाम्प खरीदने पड़ते, वहीं अब बड़े
डिस्काउंट पर स्टाम्प मिल रहे थे।
हालात यह हो गए थे कि तेलगी नासिक की सरकारी
प्रेस से ज्यादा स्टाम्प छापकर देशभर में बेचने लगा था।
ज्यादा स्टॉम छापने के लिए दो कई बार नासिक प्रैस
में अधिकारियों से मिलीभगत कर मशीन की मेंटेनेंस
का हवाला देकर स्टाम्प छापने का काम रुकवा देला
था। इससे मार्केट में स्टाम्प की किल्लत होने लगती।
फिर तेलगी अपनी प्रेस में छापे स्टाम्प मार्केट में बेचता
तेलगी ने 10 साल तक करीब 30 हजार करोड़ से
ज्यादा के स्टाम्प छापकर बेचे थे।

